ईबादत के लिए एक इंसान ढूंढ़ रहा हूँ .
पत्थरों में मैं एक भगवान ढूंढ़ रहा हूँ .
आदमी सीधा मगर जिन्दगी टेढ़ी होती है .
इसलिए टूटी पंखडियों से चहकते फूल ढूंढ़ रहा हूँ .
लोगों के साथ खुश हूँ मैं इस भागती दुनिया में.
मगर गाँव के उस पुराने घर में माँ को ढूंढ़ रहा हूँ .
वक्त कैसा है इस सच्चाई का पता कौन देगा.
मैं उस जहीन को मय्खाने में ढूंढ़ रहा हूँ .
पत्थरों में मैं एक भगवान ढूंढ़ रहा हूँ .
आदमी सीधा मगर जिन्दगी टेढ़ी होती है .
इसलिए टूटी पंखडियों से चहकते फूल ढूंढ़ रहा हूँ .
लोगों के साथ खुश हूँ मैं इस भागती दुनिया में.
मगर गाँव के उस पुराने घर में माँ को ढूंढ़ रहा हूँ .
वक्त कैसा है इस सच्चाई का पता कौन देगा.
मैं उस जहीन को मय्खाने में ढूंढ़ रहा हूँ .
इबादत के लिए एक इंसान ढूंढ रहा हूं, पत्थरों में एक भगवान ढूंढ रहा हूं। बहुत ही शानदार रचना के रूप में प्रस्तुत की है आपने। मैंनें आपका ब्लाग देखा। पहली रचना 2012 में पोस्ट की थी आपने। आप लिखते भी अच्छा है। पर सुखविदंर जी, ऐसा प्रतीत हो रहा है कि आप मैदान छोड़ गए। आज हिंदी ब्लागिंग ऐसे दौर में प्रवेश कर चुकी है, जहां हम हिंदी भाषी इससे कुछ पैसा कमा सकते हैं। पर इसके लिए लोगों को ब्लागिंग का संपूर्ण ज्ञान हासिल करना होगा। मैं तो यहां तक देखता हूं, कि ब्लागर गंभीर नहीं हैं। यदि किसी के ब्लाग पर कमेंट करके आओ, तो वह अपने ही ब्लाग पर जवाब देकर इतिश्री समझ लेता है। ऐसी दशा में तो गूगल किसी को भी कुछ देने वाला नहीं है। जिन्हें यह नहीं मालूम कि किसी ब्लाग पर किया गया कमेंट दूसरे ब्लाग का बैक लिंंक होता है। वह क्या और कैसे सफलता हासिल करेंगें।
जवाब देंहटाएंsir आपको अगर कोई लाइन या यूँ बोलूं कि मेरा लिखा कोई शब्द अच्छा लगा तो मैं आपका बहुत धन्यवादी हूँ। क्योंकि मैंने अभी तक ज्यादा कुछ लिखा नहीं हैं। लेकिन आपका मेरे ब्लॉग पर हौसलाअफजाई भरे शब्दों से मेरे द्वारा लिखा गया कुछ यात्रा वर्णन मैं जरूर पोस्ट करूँगा। एक बार फिर से धन्यवाद।
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