बुधवार, 24 मई 2017

चौपटा तथा देवरिया ताल यात्रा (02.10.2015 से 05.10.2015)


                        यात्रा करना हर व्यक्ति का शौक़ होता है। चाहे ये यात्रा किसी भी प्रकार की हो आपको आनंद प्रदान जरूर करवाती है। नई नई जगहों की यात्रा करना सिर्फ देखने की दृष्टि से आनंदित करती है बल्कि उसमें मुख्य तथ्य यह होता है कि आप ऊर्जावान तथा नए लोगों से जुड़ते चले जाते हैं। दूसरा यात्रा करने का ढंग भी अपने आप में रोमांचित होता है। हमें भी एक नयी तरह से यात्रा करने का चाव चढ़ा हुआ था और ये चाव था कि बाइक से यात्रा की जाये। काफी दिनों से इस विषय पे दिमाग अटका हुआ था लेकिन मटेरियलाइस नहीं हो पा रहा था। फिर कुछ लोगों से वार्तालाप का दौर चलता रहा। कुल मिलाकर 2 अक्टूबर 2015 का दिन तय हुआ।                      
Tungnath
           
           अपने सहयोगी जिनके साथ में पहले भी यात्रा कर चूका हूँ को साथ लेकर निकल पड़े। सुबह गांव से चला तथा आठ बजे अम्बाला कैंट के पास (खुड्डा गाँव ) में दोनों इकट्ठा हुए। हमारा प्लान तो तीन लोगों का था लेकिन कुछ निजी कारणों से तीसरा व्यक्ति (सुशिल मल्होत्रा ) स्लिप हो गया। खैर हमने अपने गंतव्य की और प्रस्थान किया। पहले दिन हमारा प्रोग्राम श्रीनगर (उत्तराखंड) पहुँचने का तय हुआ। हमने दोसड़का से साढौरा का रुख किया सड़क शानदार तथा काम आवाजाही वाली थी इसलिए बाइक 60 किलोमीटर की गति से चलायी। हाँ ये यात्रा का टलना मेरे ड्राइविंग लाइसेंस के कारण भी रहा था। हमने तय किया था कि साढौरा से छछरौली निकलेंगें। इस रस्ते को हमने इसलिए भी चुना क्योकि जगाधरी वाला रास्ता  बहुत ज्यादा ट्रैफिक तथा खस्ता हालत सड़क के कारण बाइक चलने लायक नहीं है। साढौरा से बिलासपुर (हरियाणा) पहुंचे। अब चूँकि हम बिलासपुर पहली बार आये थे , ऊपर से जिससे रास्ता पूछा उसने गलत बता दिया या यूँ कहें हम गलत रास्ते पे निकल पड़े  ये छछरौली तो नहीं जा रहा था। अब हम बिलासपुर से 7-8 किलोमीटर निकल चुके थे तो रास्ता दुबारा पूछा तो बताया गया कि आप गलत रस्ते पर हैं। परन्तु ये पता लगा कि ये रास्ता खिजराबाद निकलेगा जो की छछरौली (जगाधरी पोंटा साहिब रोड ) से पोंटा साहिब की तरफ है। अतः ये भी अच्छा हुआ। लेकिन पेंच सड़क की स्थिति को लेकर था। बिलासपुर से लेकर खिजराबाद तक सड़क पैदल चलने लायक भी नहीं थी। फिर भी जैसे तैसे खिजराबाद पहुँच गए। इन 16-17 किलोमीटर को तय करने में एक घंटा बर्बाद हो गया।
            अब आगे सड़क शानदार थी तो चलते गए। हमने आधिकारिक रूप से पहला ठहराव पोंटा साहिब में लिया जिसमें चाय पकोड़ा शामिल हुआ। मुझे अपने हेलमेट से परेशानी हो रही थी। मेरे हेलमेट का शीशा खराब हो रखा था जिससे की दिखने में परेशानी आ रही थी। शीशा बदलवाना जरुरी था क्योंकि आगे हमें हो सकता है  कुछ रास्ता रात में चलना पड़ता। हमने हेलमेट रिपेयरिंग की दुकान ढूंढी तथा शीशा बदलवाया। पोंटा से ऋषिकेश रोड पकड़ लिया। सड़क तो ये भी अच्छी  बनी है परन्तु इस सड़क पे भी समस्या ये है की हर दो किलोमीटर के बाद बड़े-बड़े ब्रेकर बना रखे हैं जो सुचारु रूप से चलने में बाधक रहे। कहने का मतलब ये की हमने ऋषिकेश पहुँचने के तय समय से 30-40 मिनट ज्यादा लिए। अब थकावट भी अपना असर दिखाना आरम्भ करने लग गई थी।
            मेरे पास एक पिठ्ठू बैग था जिससे की मेरे कन्धों पर दबाव आ रहा था। हमने ऋषिकेश पार करने के बाद गंगा तट पर बने आश्रम में थोड़ा आराम करने का सोच रखा था। यह राम  आश्रम शहर से देव प्रयाग रोड पर 5 किलोमीटर दूर स्थित है। इस आश्रम का जिक्र इसलिए कर रहा हूँ की ये बहुत शांत जगह बना हुआ है तथा मेरे सहयोगी नरेश सहगल इससे जुड़े रहे हैं। आश्रम में हमें चाय तैयार मिली जोकि इतनी कड़क बनी हुई थी की लगभग आधी थकावट छूमंतर हो गई। चाय के साथ हमने लंच (चार बजे) किया। लंच सहगल साहब घर से लेकर आये थे। आधे घंटे बाद आश्रम से निकल पड़े। इस रमणीक स्थल की तस्वीरें सहगल साहब के कैमरे में कैद कर ली गई।
            अब हमारी योजना जोकि श्रीनगर में पहला पड़ाव की थी वह सिरे चढ़ती नजर नहीं रही थी। जैसे जैसे हम पहाड़ी इलाके में चल रहे थे तो हलकी हलकी ठंडक भी महसूस हो रही थी जिससे बाइक चलने में मजा रहा था। सूंदर दृश्यों को हम अपने कैमरे में कैद करते हुए चलते गए। देव प्रयाग पहुँचते- पहुँचते हमें अँधेरा हो गया था। हम ये तय करके चले थे की रात में सफर नहीं करेंगें। वैसे भी एक तो थकावट ,दूसरी अँधेरा , तीसरा पहाड़ों पे बाइक से चलना तीनों हमें रुकने का ईशारा कर रहे थे। देव प्रयाग एक छोटा सा शहर है। धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यहाँ भागीरथी तथा अलकनंदा नदियों का संगम है। दोनों मिलने के बाद दूसरी धार्मिक नदी गंगा का उद्भव होता है जोकि हिन्दुओं के लिए पवित्र मानी जाती है। अगर देखा जाये तो गंगा नदी यहाँ प्रदूषण मुक्त है। पानी एकदम साफ़ सुथरा है। हमने बिलकुल संगम पर कमरा लिया तथा खा-पीकर सो गए। थकावट के कारण नींद भी काफी अच्छी तरह से आई। इस प्रकार पहले दिन की यात्रा  292 K.M तय की।
            3 अक्टूबर सुबह उठ कर हमने अपनी अपनी मोटरसाइकिल (HR01AJ 9355 हीरो स्प्लेंडर)की सफाई  की ,तेल पानी की चिंता थी नहीं क्योंकि अभी भी टैंक 90% दिखा रहा था। 7 बजे हमने आगे की अपनी यात्रा शुरू कर दी। श्रीनगर पहुँच कर (जो की काफी बड़ा शहर है तथा जनपद भी है ) नाश्ता किया और आगे की रह पकड़ी। इस समय  हम रूद्र प्रयाग में थे।  रूद्र प्रयाग से चौपटा के लिए दो  रास्ते निकलते हैं। एक बाईपास तथा दूसरा शहर से हो कर गुजरता है। अतः हमने बाईपास वाला रास्ता चुना। ये रास्ता एक तरफ़ा ट्रैफिक के लिए है। कहने का मतलब जिधर हम जा रहे थे वो ट्रैफिक Allowed नहीं है। पुलिसवाले ने हमें रुकने का इशारा किया तथा बोला गया की इधर से आप नहीं जा सकते। लेकिन हमारी विनती को उसने अनदेखा नहीं किया तथा जाने की इजाजत दे दी।
            जैसे ही हम इस रस्ते पे मुडे एकदम ढलान है क्योंकि अलकनंदा का पुल पार करके दूसरी तरफ निकलना होता है। ढलान पर काफी बारीक पत्थर (बजरी) हैं। यहाँ पर छोटा सा हादसा हो गया। पुल से ठीक पहले ब्रेक लगा कर उतरते समय सहगल की बाइक पत्थर पे फिसल गई। उनके दाहिने हाथ में चोट लग गई और थोड़ा घुटना भी छिल गया। अब हमारे पास एक बैंडऐड थो जो की सहगलजी के हाथ पर चिपका दी गई। आगे जा कर एक केमिस्ट (अगस्तमुनि ) से हाथ पर पट्टी करवाई और कुछ दवाई  ले कर निकल पड़े। हाँ रूद्र प्रयाग में भी एक संगम है यहाँ पर अलकनंदा तथा मंदाकिनी नदियां मिलती हैं जो की निचे तरफ जाते हुए अलकनंदा कहलाती है। तात्प्र्यः ये की मंदाकिनी नदी रूद्र प्रयाग में समाप्त हो जाती है। यह संगम चूँकि शहर के अंदर वाले रस्ते में पड़ता है इसलिए हम नहीं देख पाए लेकिन देखेंगे जरूर वापसी में।
            अगस्तमुनि से अब हम चौपटा की तरफ बढ़ने लगे। रास्ते में ( चौपटा से 15 KM पहले) एक चाय की दुकान पे कुछ समय के लिए विश्राम किया और चाय पी।  चाय काफी अच्छी बनी थी तथा ये गांव आखिरी बस्ती है  इसके बाद चौपटा तक कोई मकान नहीं है। इस चायवाले से रास्ते के बारे मैं पूछताछ की कि सड़क कैसी है। उसने देवरिया ताल के बारे में बताया कि यहाँ से तीन KM चलने के बाद बांये ऊपर की तरफ एक सड़क जाएगी जो आपको देवरिया ताल पहुंचा देगी। लेकिन हमने यहाँ बैठ कर प्रोग्राम में बदलाव कर दिया। अब हम पहले तुंगनाथ (चौपटा) जायेंगें तथा आते वक्त देवरिया ताल।
            जब वहां से निकले तो हवा में ठंडक काफी बढ़ गई थी। सड़क सिंगल  रोड है परन्तु बहुत सुन्दर बनी है और ट्रैफिक भी बहुत कम है। अब इस रस्ते पे आप एकबार भी समतल या निचे नहीं उतरते हैं। कहने का मतलब आपकी बाइक फुल लोड में चलती है। अति सूंदर रमणीक स्थल से गुजर रहे थे। खुशगवार मौसम। बड़े बड़े हरयाली वाले पहाड़ी मैदान (बुग्याल ),मनमोहक दृश्य। इस स्थान पे बाइक चलाने में परेशानी कि बाइक चलाएं या नज़ारे देखें। रात में काफी ठण्ड बढ़ जाती है। पेड़ों से पानी टपकता रहता है जिससे सड़क पर काई जमीं रहती है।
            मैंने अपनी जिंदगी में पहाड़ों पे इतना शानदार तथा शांत क्षेत्र नहीं देखा था। खैर चौपटा पहुँच कर सबसे पहले कमरा बुक कर लिया क्योंकि सप्ताहांत के कारण भीड़ भी ठीक ठाक थी। हमने अपना सामान कमरे में रख दिया तथा बाइक भी उसके आगे लगा दी। मेरा तो मन चलने को कर ही नहीं रहा था तुंगनाथ जाने को क्यूंकि एक तो में नास्तिक ऊपर से सुंदरता को एकटकी लगाए देख रहा था। खैर सहगल साहब ने कहा की यहाँ बैठने का मतलब बाकी सुंदरता आप नहीं देखना चाहते। अब न जाने का तो मतलब नहीं था। डंडा उठाया चल पड़े तुंगनाथ बाबा के दरबार की तरफ। यह शिव मंदिर है। यह बहुत प्राचीन मंदिर लगता है। माना ये जाता है कि दुनिया में सबसे ऊंचाई पर तुंगनाथ मंदिर है। यह ट्रैक 3 KM के लगभग होगा। हमें इसे चढ़ने में कोई परेशानी नहीं आई। ये संध्या काल था ऊपर से मौसम भी कुछ खराब था । सूर्यास्त होने वाला था। अब फंसा पेंच। हुआ ये की अब चंदरशीला नहीं जा पायेंगें। चंदरशीला की चढ़ाई एक से डेढ़ KM है। अब इसी मंदिर के आस पास की तस्वीरें लेने लगे ताकि इस नज़ारे का लुत्फ़ तो लें। इस मंदिर में भी पण्डे बैठे हैं। मैं पंडों तथा गिद्धों में ज़्यादा अंतर नहीं मानता ( शारीरिक संरचना को छोड़ कर ) और न ही मानना चाहिए। यहाँ पर पर्यटकों के साथ साथ घुमकड़ों की तादात काफी ज्यादां रहती है। यहाँ पर काफी संख्या में अस्थायी होटल बने हुए हैं ,वो इसलिए की ये इलाका छह महीने बर्फ से ढका होने के कारण बंद रहता है। 
            वापिस पहुँचते-पहुँचते अँधेरा हो चूका था , निचे आ कर हमने चाय ली। यहाँ अस्थायी होटल वाले ही दुकानदार होते हैं। वो ढाबा भी चलाते हैं तथा रोजमर्रा की वस्तुएं भी रखते हैं। हमने कुछ फल लिए तथा कमरे मैं जाने से पहले उनसे खाने के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि 10 बजे तक मिलता है। पहाड़ी इलाकों में इस नियम का काफी सख्ताई से पालन होता है की जो समय बताया गया वास्तव में उसके बाद कुछ नहीं मिलता है। अब कमरे में पहुंचे तो वहां पर बिजली भी नहीं है जिसका कारण ये कि यह आवासीय क्षेत्र नहीं है। यहाँ पर सिर्फ सोलर लाइट ही होती है। रात में आपको एक ट्यूब लाइट जलानी होती है जिसका कण्ट्रोल होटल वालों के पास होता है। अतयः हम जैसे ही कमरे में गए ट्यूब लाइट जला दी गई। अब खा पी कर रजाई ली तथा गहरी नींद में सो गए।
            अगले दिन फ्रेश वगैरह हो कर अपनी बाइक उठाई और वापसी शुरू। वापसी में हमें देवरियाताल जाना था सो उस चाय की दूकान से 3 KM पहले दाहिंने ऊपर की तरफ मुड़ गए तथा सारी गांव पहुंचे जहाँ से ताल पे जाने का रास्ता शुरू होता है। यहाँ हमारे साथ समस्या थी की मोबाइलों की बैटरी गुल हो गयीं थी। हमने पहले मोबाइलों को चार्ज करने की सोची। इसके लिए हमें उचित दूकान मिली, जो की नास्ता भी बनाता है। अपने ही घर में दुकान चलाने वाले ने  हमें दो दो परांठों का नास्ता करवाया। इतने में हमारा कैमरा चार्ज हो गया। चूँकि ऊपर शायद सिग्नल न हों तो हमने अपने बैग इसी दुकान पे छोड़ कर मोबाईल भी उसी दुकानदार को दे दिए ताकि वो चार्ज हो जाएँ।
            नास्ता करने के बाद देवरियाताल की चढाई शुरू कर दी। ये कोई अढ़ाई KM का ट्रैक है। ऊपर अति सूंदर ताल है। एकदम शानदार नजारा है  इस ताल पर। कुछ लोग उस खिली धुप में सिले-सिले मौसम का लुत्फ़ अलग-अलग अंदाज़ में ले रहे थे। कुछ स्त्रियां (दो विदेशी भी) बचपन वाले खेल खेल रही थीं। हमें एक ग्रुप स्कूल के छोटे बच्चों (10 साल तक) जो कि शायद सबसे ज्यादां मजे ले रहे थे का मिला । उनके टीचर से थोड़ी देर गुफ्तगू भी की तथा बच्चों के साथ मस्ती भरी फोटोग्राफी की। कोई दो घंटे यहाँ बिताने के बाद हमने वहां से रवानगी ली तथा निचे आ कर वापसी की रह पकड़ी।