बुधवार, 27 सितंबर 2017

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बुधवार, 24 मई 2017

चौपटा तथा देवरिया ताल यात्रा (02.10.2015 से 05.10.2015)


                        यात्रा करना हर व्यक्ति का शौक़ होता है। चाहे ये यात्रा किसी भी प्रकार की हो आपको आनंद प्रदान जरूर करवाती है। नई नई जगहों की यात्रा करना सिर्फ देखने की दृष्टि से आनंदित करती है बल्कि उसमें मुख्य तथ्य यह होता है कि आप ऊर्जावान तथा नए लोगों से जुड़ते चले जाते हैं। दूसरा यात्रा करने का ढंग भी अपने आप में रोमांचित होता है। हमें भी एक नयी तरह से यात्रा करने का चाव चढ़ा हुआ था और ये चाव था कि बाइक से यात्रा की जाये। काफी दिनों से इस विषय पे दिमाग अटका हुआ था लेकिन मटेरियलाइस नहीं हो पा रहा था। फिर कुछ लोगों से वार्तालाप का दौर चलता रहा। कुल मिलाकर 2 अक्टूबर 2015 का दिन तय हुआ।                      
Tungnath
           
           अपने सहयोगी जिनके साथ में पहले भी यात्रा कर चूका हूँ को साथ लेकर निकल पड़े। सुबह गांव से चला तथा आठ बजे अम्बाला कैंट के पास (खुड्डा गाँव ) में दोनों इकट्ठा हुए। हमारा प्लान तो तीन लोगों का था लेकिन कुछ निजी कारणों से तीसरा व्यक्ति (सुशिल मल्होत्रा ) स्लिप हो गया। खैर हमने अपने गंतव्य की और प्रस्थान किया। पहले दिन हमारा प्रोग्राम श्रीनगर (उत्तराखंड) पहुँचने का तय हुआ। हमने दोसड़का से साढौरा का रुख किया सड़क शानदार तथा काम आवाजाही वाली थी इसलिए बाइक 60 किलोमीटर की गति से चलायी। हाँ ये यात्रा का टलना मेरे ड्राइविंग लाइसेंस के कारण भी रहा था। हमने तय किया था कि साढौरा से छछरौली निकलेंगें। इस रस्ते को हमने इसलिए भी चुना क्योकि जगाधरी वाला रास्ता  बहुत ज्यादा ट्रैफिक तथा खस्ता हालत सड़क के कारण बाइक चलने लायक नहीं है। साढौरा से बिलासपुर (हरियाणा) पहुंचे। अब चूँकि हम बिलासपुर पहली बार आये थे , ऊपर से जिससे रास्ता पूछा उसने गलत बता दिया या यूँ कहें हम गलत रास्ते पे निकल पड़े  ये छछरौली तो नहीं जा रहा था। अब हम बिलासपुर से 7-8 किलोमीटर निकल चुके थे तो रास्ता दुबारा पूछा तो बताया गया कि आप गलत रस्ते पर हैं। परन्तु ये पता लगा कि ये रास्ता खिजराबाद निकलेगा जो की छछरौली (जगाधरी पोंटा साहिब रोड ) से पोंटा साहिब की तरफ है। अतः ये भी अच्छा हुआ। लेकिन पेंच सड़क की स्थिति को लेकर था। बिलासपुर से लेकर खिजराबाद तक सड़क पैदल चलने लायक भी नहीं थी। फिर भी जैसे तैसे खिजराबाद पहुँच गए। इन 16-17 किलोमीटर को तय करने में एक घंटा बर्बाद हो गया।
            अब आगे सड़क शानदार थी तो चलते गए। हमने आधिकारिक रूप से पहला ठहराव पोंटा साहिब में लिया जिसमें चाय पकोड़ा शामिल हुआ। मुझे अपने हेलमेट से परेशानी हो रही थी। मेरे हेलमेट का शीशा खराब हो रखा था जिससे की दिखने में परेशानी आ रही थी। शीशा बदलवाना जरुरी था क्योंकि आगे हमें हो सकता है  कुछ रास्ता रात में चलना पड़ता। हमने हेलमेट रिपेयरिंग की दुकान ढूंढी तथा शीशा बदलवाया। पोंटा से ऋषिकेश रोड पकड़ लिया। सड़क तो ये भी अच्छी  बनी है परन्तु इस सड़क पे भी समस्या ये है की हर दो किलोमीटर के बाद बड़े-बड़े ब्रेकर बना रखे हैं जो सुचारु रूप से चलने में बाधक रहे। कहने का मतलब ये की हमने ऋषिकेश पहुँचने के तय समय से 30-40 मिनट ज्यादा लिए। अब थकावट भी अपना असर दिखाना आरम्भ करने लग गई थी।
            मेरे पास एक पिठ्ठू बैग था जिससे की मेरे कन्धों पर दबाव आ रहा था। हमने ऋषिकेश पार करने के बाद गंगा तट पर बने आश्रम में थोड़ा आराम करने का सोच रखा था। यह राम  आश्रम शहर से देव प्रयाग रोड पर 5 किलोमीटर दूर स्थित है। इस आश्रम का जिक्र इसलिए कर रहा हूँ की ये बहुत शांत जगह बना हुआ है तथा मेरे सहयोगी नरेश सहगल इससे जुड़े रहे हैं। आश्रम में हमें चाय तैयार मिली जोकि इतनी कड़क बनी हुई थी की लगभग आधी थकावट छूमंतर हो गई। चाय के साथ हमने लंच (चार बजे) किया। लंच सहगल साहब घर से लेकर आये थे। आधे घंटे बाद आश्रम से निकल पड़े। इस रमणीक स्थल की तस्वीरें सहगल साहब के कैमरे में कैद कर ली गई।
            अब हमारी योजना जोकि श्रीनगर में पहला पड़ाव की थी वह सिरे चढ़ती नजर नहीं रही थी। जैसे जैसे हम पहाड़ी इलाके में चल रहे थे तो हलकी हलकी ठंडक भी महसूस हो रही थी जिससे बाइक चलने में मजा रहा था। सूंदर दृश्यों को हम अपने कैमरे में कैद करते हुए चलते गए। देव प्रयाग पहुँचते- पहुँचते हमें अँधेरा हो गया था। हम ये तय करके चले थे की रात में सफर नहीं करेंगें। वैसे भी एक तो थकावट ,दूसरी अँधेरा , तीसरा पहाड़ों पे बाइक से चलना तीनों हमें रुकने का ईशारा कर रहे थे। देव प्रयाग एक छोटा सा शहर है। धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यहाँ भागीरथी तथा अलकनंदा नदियों का संगम है। दोनों मिलने के बाद दूसरी धार्मिक नदी गंगा का उद्भव होता है जोकि हिन्दुओं के लिए पवित्र मानी जाती है। अगर देखा जाये तो गंगा नदी यहाँ प्रदूषण मुक्त है। पानी एकदम साफ़ सुथरा है। हमने बिलकुल संगम पर कमरा लिया तथा खा-पीकर सो गए। थकावट के कारण नींद भी काफी अच्छी तरह से आई। इस प्रकार पहले दिन की यात्रा  292 K.M तय की।
            3 अक्टूबर सुबह उठ कर हमने अपनी अपनी मोटरसाइकिल (HR01AJ 9355 हीरो स्प्लेंडर)की सफाई  की ,तेल पानी की चिंता थी नहीं क्योंकि अभी भी टैंक 90% दिखा रहा था। 7 बजे हमने आगे की अपनी यात्रा शुरू कर दी। श्रीनगर पहुँच कर (जो की काफी बड़ा शहर है तथा जनपद भी है ) नाश्ता किया और आगे की रह पकड़ी। इस समय  हम रूद्र प्रयाग में थे।  रूद्र प्रयाग से चौपटा के लिए दो  रास्ते निकलते हैं। एक बाईपास तथा दूसरा शहर से हो कर गुजरता है। अतः हमने बाईपास वाला रास्ता चुना। ये रास्ता एक तरफ़ा ट्रैफिक के लिए है। कहने का मतलब जिधर हम जा रहे थे वो ट्रैफिक Allowed नहीं है। पुलिसवाले ने हमें रुकने का इशारा किया तथा बोला गया की इधर से आप नहीं जा सकते। लेकिन हमारी विनती को उसने अनदेखा नहीं किया तथा जाने की इजाजत दे दी।
            जैसे ही हम इस रस्ते पे मुडे एकदम ढलान है क्योंकि अलकनंदा का पुल पार करके दूसरी तरफ निकलना होता है। ढलान पर काफी बारीक पत्थर (बजरी) हैं। यहाँ पर छोटा सा हादसा हो गया। पुल से ठीक पहले ब्रेक लगा कर उतरते समय सहगल की बाइक पत्थर पे फिसल गई। उनके दाहिने हाथ में चोट लग गई और थोड़ा घुटना भी छिल गया। अब हमारे पास एक बैंडऐड थो जो की सहगलजी के हाथ पर चिपका दी गई। आगे जा कर एक केमिस्ट (अगस्तमुनि ) से हाथ पर पट्टी करवाई और कुछ दवाई  ले कर निकल पड़े। हाँ रूद्र प्रयाग में भी एक संगम है यहाँ पर अलकनंदा तथा मंदाकिनी नदियां मिलती हैं जो की निचे तरफ जाते हुए अलकनंदा कहलाती है। तात्प्र्यः ये की मंदाकिनी नदी रूद्र प्रयाग में समाप्त हो जाती है। यह संगम चूँकि शहर के अंदर वाले रस्ते में पड़ता है इसलिए हम नहीं देख पाए लेकिन देखेंगे जरूर वापसी में।
            अगस्तमुनि से अब हम चौपटा की तरफ बढ़ने लगे। रास्ते में ( चौपटा से 15 KM पहले) एक चाय की दुकान पे कुछ समय के लिए विश्राम किया और चाय पी।  चाय काफी अच्छी बनी थी तथा ये गांव आखिरी बस्ती है  इसके बाद चौपटा तक कोई मकान नहीं है। इस चायवाले से रास्ते के बारे मैं पूछताछ की कि सड़क कैसी है। उसने देवरिया ताल के बारे में बताया कि यहाँ से तीन KM चलने के बाद बांये ऊपर की तरफ एक सड़क जाएगी जो आपको देवरिया ताल पहुंचा देगी। लेकिन हमने यहाँ बैठ कर प्रोग्राम में बदलाव कर दिया। अब हम पहले तुंगनाथ (चौपटा) जायेंगें तथा आते वक्त देवरिया ताल।
            जब वहां से निकले तो हवा में ठंडक काफी बढ़ गई थी। सड़क सिंगल  रोड है परन्तु बहुत सुन्दर बनी है और ट्रैफिक भी बहुत कम है। अब इस रस्ते पे आप एकबार भी समतल या निचे नहीं उतरते हैं। कहने का मतलब आपकी बाइक फुल लोड में चलती है। अति सूंदर रमणीक स्थल से गुजर रहे थे। खुशगवार मौसम। बड़े बड़े हरयाली वाले पहाड़ी मैदान (बुग्याल ),मनमोहक दृश्य। इस स्थान पे बाइक चलाने में परेशानी कि बाइक चलाएं या नज़ारे देखें। रात में काफी ठण्ड बढ़ जाती है। पेड़ों से पानी टपकता रहता है जिससे सड़क पर काई जमीं रहती है।
            मैंने अपनी जिंदगी में पहाड़ों पे इतना शानदार तथा शांत क्षेत्र नहीं देखा था। खैर चौपटा पहुँच कर सबसे पहले कमरा बुक कर लिया क्योंकि सप्ताहांत के कारण भीड़ भी ठीक ठाक थी। हमने अपना सामान कमरे में रख दिया तथा बाइक भी उसके आगे लगा दी। मेरा तो मन चलने को कर ही नहीं रहा था तुंगनाथ जाने को क्यूंकि एक तो में नास्तिक ऊपर से सुंदरता को एकटकी लगाए देख रहा था। खैर सहगल साहब ने कहा की यहाँ बैठने का मतलब बाकी सुंदरता आप नहीं देखना चाहते। अब न जाने का तो मतलब नहीं था। डंडा उठाया चल पड़े तुंगनाथ बाबा के दरबार की तरफ। यह शिव मंदिर है। यह बहुत प्राचीन मंदिर लगता है। माना ये जाता है कि दुनिया में सबसे ऊंचाई पर तुंगनाथ मंदिर है। यह ट्रैक 3 KM के लगभग होगा। हमें इसे चढ़ने में कोई परेशानी नहीं आई। ये संध्या काल था ऊपर से मौसम भी कुछ खराब था । सूर्यास्त होने वाला था। अब फंसा पेंच। हुआ ये की अब चंदरशीला नहीं जा पायेंगें। चंदरशीला की चढ़ाई एक से डेढ़ KM है। अब इसी मंदिर के आस पास की तस्वीरें लेने लगे ताकि इस नज़ारे का लुत्फ़ तो लें। इस मंदिर में भी पण्डे बैठे हैं। मैं पंडों तथा गिद्धों में ज़्यादा अंतर नहीं मानता ( शारीरिक संरचना को छोड़ कर ) और न ही मानना चाहिए। यहाँ पर पर्यटकों के साथ साथ घुमकड़ों की तादात काफी ज्यादां रहती है। यहाँ पर काफी संख्या में अस्थायी होटल बने हुए हैं ,वो इसलिए की ये इलाका छह महीने बर्फ से ढका होने के कारण बंद रहता है। 
            वापिस पहुँचते-पहुँचते अँधेरा हो चूका था , निचे आ कर हमने चाय ली। यहाँ अस्थायी होटल वाले ही दुकानदार होते हैं। वो ढाबा भी चलाते हैं तथा रोजमर्रा की वस्तुएं भी रखते हैं। हमने कुछ फल लिए तथा कमरे मैं जाने से पहले उनसे खाने के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि 10 बजे तक मिलता है। पहाड़ी इलाकों में इस नियम का काफी सख्ताई से पालन होता है की जो समय बताया गया वास्तव में उसके बाद कुछ नहीं मिलता है। अब कमरे में पहुंचे तो वहां पर बिजली भी नहीं है जिसका कारण ये कि यह आवासीय क्षेत्र नहीं है। यहाँ पर सिर्फ सोलर लाइट ही होती है। रात में आपको एक ट्यूब लाइट जलानी होती है जिसका कण्ट्रोल होटल वालों के पास होता है। अतयः हम जैसे ही कमरे में गए ट्यूब लाइट जला दी गई। अब खा पी कर रजाई ली तथा गहरी नींद में सो गए।
            अगले दिन फ्रेश वगैरह हो कर अपनी बाइक उठाई और वापसी शुरू। वापसी में हमें देवरियाताल जाना था सो उस चाय की दूकान से 3 KM पहले दाहिंने ऊपर की तरफ मुड़ गए तथा सारी गांव पहुंचे जहाँ से ताल पे जाने का रास्ता शुरू होता है। यहाँ हमारे साथ समस्या थी की मोबाइलों की बैटरी गुल हो गयीं थी। हमने पहले मोबाइलों को चार्ज करने की सोची। इसके लिए हमें उचित दूकान मिली, जो की नास्ता भी बनाता है। अपने ही घर में दुकान चलाने वाले ने  हमें दो दो परांठों का नास्ता करवाया। इतने में हमारा कैमरा चार्ज हो गया। चूँकि ऊपर शायद सिग्नल न हों तो हमने अपने बैग इसी दुकान पे छोड़ कर मोबाईल भी उसी दुकानदार को दे दिए ताकि वो चार्ज हो जाएँ।
            नास्ता करने के बाद देवरियाताल की चढाई शुरू कर दी। ये कोई अढ़ाई KM का ट्रैक है। ऊपर अति सूंदर ताल है। एकदम शानदार नजारा है  इस ताल पर। कुछ लोग उस खिली धुप में सिले-सिले मौसम का लुत्फ़ अलग-अलग अंदाज़ में ले रहे थे। कुछ स्त्रियां (दो विदेशी भी) बचपन वाले खेल खेल रही थीं। हमें एक ग्रुप स्कूल के छोटे बच्चों (10 साल तक) जो कि शायद सबसे ज्यादां मजे ले रहे थे का मिला । उनके टीचर से थोड़ी देर गुफ्तगू भी की तथा बच्चों के साथ मस्ती भरी फोटोग्राफी की। कोई दो घंटे यहाँ बिताने के बाद हमने वहां से रवानगी ली तथा निचे आ कर वापसी की रह पकड़ी।   





































गुरुवार, 23 फ़रवरी 2017

भ्रांति

         समय इतना आगे बढ़ गया कि पैन-कॉपी से लेकर डिजिटल खिलौने (मोबाइल , आई-पैड आदि ) तक आम आदमी कि पहुँच में है। परंतु फिर भी ऐसा लगता है कि बहुत कुछ है जो याद नहीं रहा है। सोचा चलो इन खिलौनों का इस्तेमाल कर लेते हैं। अब अगर इन्टरनेट को इनके साथ जोड़ लें तब हम बन जाते हैं सुपरमैन। लेकिन मैं जो वस्तुएं ढूंढना चाह रहा था वैसा कुछ मिला नहीं। कहते हैं जो गुजर  गया वो अच्छा था लेकिन आगे बढ़ो। हमें लगा अगर आगे नहीं बढ़ोगे तो अस्तित्व खतरे में होगा। इस अस्तित्व को खतरा हो इसलिए जरुरी नहीं आगे ही बढो,पीछे कुछ नहीं है। पीछे जाना कई बार आगे से भी बढ़ कर होता है। समय के सन्दर्भ में हमारे ऊपर बहुत ज्ञान पेला जा चूका  है कि इसका क्या करना चाहिए।  जितने भी ये ज्ञानी हैं सब फेल के फेल। हमें कई बार ये Confusion रहा कि ये बन्दा बुजुर्ग भी है,अनुतीर्ण भी है। इस व्यक्ति का कमाल ये कि स्वयं को दुनिया का सबसे सफल व्यक्ति समझता है। इस प्रकार के ज्ञानियो से मेरा बहुत पाला पड़ा है। तब क्या समय से नफरत करूँ या इन ज्ञानियो से। शायद मुझे धैर्य के साथ होना चाहिए क्योंकि वो समय के बारे में बेहतरीन जाना जाता है। हा हा धैर्य तो हमें दुश्मन लगता है। इससे तो हमारा परिवारिक सम्बन्ध भी नहीं है। शायद धैर्य मुझे इसलिए पसंद नहीं क्योंकि ये बद मिजाजी सा लगता है। अब अगर ये मुझे पसंद नहीं तो इसे मेरे पीछे नहीं आना चाहिए,बहुत दुनिया है जो इसके इन्तेजार कर रही है। बड़ी अदबी से इस्तेकबाल करने वाले हैं। परन्तु शायद इसको भी समय की समझ नहीं है इसलिए हमारे पीछे पड़ा रहता है।

             एक चीज धैर्य के साथ मजेदार जुडी हुई है। अब कहा जाता है कि जहाँ दो बर्तन होंगे तो वो टकराएंगे यनिके थोड़ा शोर करेंगे। अब अगर बर्तन जितने अधिक हों तो वो उतने ज्यादा म्यूजिकल होंगे। मुझे म्यूजिक पसंद है एक,दूसरा कहते हैं जहाँ थोड़ा  झगड़ा होगा तो वहां प्यार अवश्य विराजमान होगा। इसलिए इस तथ्य ( धैर्य ) को अपने से दूर रखें इससे आपका घर म्यूजिकल तथा प्यारा बना रहेगा। अब समय भी आपके लिए इतना महत्व नहीं रखता जितना ज्ञानी मानते हैं। आराम से उठिये , मस्त सोईए। जागने के बाद आराम से खा-पी कर बिस्तर छोड़िये। अगर ज्यादा गन्दा महसूस कर रहे हैं तो नहा-धो कर घर से निकलिए। अपनी दिनचर्य निपटाएं। आकर आराम कीजिये ताकि शरीर को ज्यादा कष्ट न हो तथा आप सेहतमंद बने रहें ? आज 5 जुलाई 2015।

गुरुवार, 19 जनवरी 2017

पांडिचेरी यात्रा (7 to 10 January,2016)



            मैं  रोज की तरह अपने ऑफिस में बैठा था की दिल्ली से एक घनिष्ठ मित्र का फ़ोन आया। वो कहने लगे की पांडिचेरी चलना है। क्योंकि आप का पहले कोई प्लान नहीं है तो एकदम प्रतिक्रिया देना बड़ा मुश्किल है। उन्होंने बोला की अन्नामलाई यूनिवर्सिटी में थोड़ा काम है और उसके बाद 2-3 दिन घूम आएंगे। मैंने कहा मैं आपको सोच के बताता हूँ। मैंने शाम को उसे बोला कि ठीक है चलते हैं। इस प्रकार  उसने दिल्ली से चेन्नई की हवाई जहाज से आने जाने की टिकटें बुक कर दी। पांडिचेरी के बजाय चेन्नई की टिकेट हमें दो हज़ार रुपये काम में मिल रही थी यानि के आठ हज़ार की बचत। तय ये हुआ की हम चेन्नई में नहीं रुकेंगे सीधा पॉन्डिचेरी पहुंचेंगे। ये सब इसलिए की थोड़े समय में सब जगह तो घूम नहीं सकते कम से कम एक स्थान तो दो दिन में आराम से घुमा जा सकता है। सात मार्च को 13:20 की इंडिगो एयरवेज की फ्लाइट से हमें दिल्ली से जाना था। मैं शैलेन्द्र सिंह के पास छह मार्च को दिल्ली चला गया। तय समयानुसार हम दोनों एयरपोर्ट में दाखिल हुए तथा फ्लाइट में बैठ गए। यहाँ एक बात ओर ये मेरी पहली हवाई यात्रा थी। इसलिए खासकर मुझे जिज्ञासा थी की जहाज़ बैठने के बाद कैसा लगता है। हुआ तो कुछ नहीं लेकिन विंडो सीट मिलने से धरती की वस्तुओं को निहारना अच्छा लगा। तय समयानुसार हम 16:10 पे चेन्नई पहुंचे। अब एयरपोर्ट से निकल कर गिण्डी बस अड्डे पहुंचने के लिए ऑटो ले लिया। गिण्डी बस अड्डा लगबग 7-8 किलोमीटर है। पांडिचेरी की बस पकड़ने के लिए  ये स्थान सबसे उपयुक्त है। गिण्डी बस अड्डे पे पहुँच कर हमने डोसा खाया तथा बस के बारे में जानकारी लेने लगे। हमें एक टोम्पो ट्रैवेलर वाला मिला। उसने बताया की वो पांडिचेरी जा रहा है। हमारे लिए इससे अच्छा क्या हो सकता था उसपे टंग लिए। अब ये लगभग शाम के छह बजे का वक़्त था। चेन्नई से पांडिचेरी की दुरी लगभग 155-160 किलोमीटर है यानि के 3 घंटे कम से कम। पांडिचेरी के लिए दो रस्ते हैं एक वाया ईस्टर्न कोस्ट रोड (155 कि. मी.)जो की महाबलीपुरम ,कडलूर वगैरह हो कर निकालता है तथा दूसरा NH 32 (170 कि. मी.) है। हम पहलेवाले से जा रहे थे। अब चूँकि अँधेरा भी होने लगा था इसलिए हम ने भी झपकी लेना उचित समझा। गाडी में हमारे साथ तीन चार लोग और थे जो की रस्ते में ही उतर चुके थे।साढ़े आठ बजे हम पांडिचेरी बस अड्डे पहुँच गए।
          अब हमने रात में रुकने के लिए होटल ढूंढने लगे। जब कोई होटल ठीक सा नहीं जमा तो ओयो होटल्स  वालों से संपर्क किया। इंदिरा गाँधी मेडिकल कॉलेज एंड रिसर्च इंस्टिट्यूट के पास होटल तमीज़ह पार्क में ओयो रूम 1100 रुपये में मिल गया जिसमें नास्ता फ्री। तीन रात के लिए बुक किया तथा खा पी के सो गए। 8 मार्च सुबह  हमें अन्नामलाई यूनिवर्सिटी के  लिए निकलना था जो की चिदाम्बरम में है।  चिदाम्बरम पांडिचेरी से 62 किलोमीटर है। नास्ता करने के बाद हम बस अड्डे पहुंचे। सबसे पहली समस्या यहाँ आकर हुई वो ये की बस काउंटर्स तथा बसों में लगे बोर्ड सभी तमिल भाषा में लिखे हुए। पूछने पर काफी लोगों ने कुछ नहीं बताया। शायद वो इंग्लिश नहीं जानते होंगे। वैसे हम लोग जैसा मानते हैं तमिल वालों की इंग्लिश इतनी अच्छी भी नहीं है। खैर जैसे तैसे हमने बस पकड़ी ग्यारह बजे तक चिदाम्बरम पहुँच गए। वहां यूनिवर्सिटी का काम निबटने में शाम हो गई जिसमें सबसे बड़ा योगदान वहां के लंच ब्रेक का है जो की दो घंटे चलता है। सभी कर्मचारियों में बड़ी एकरूपता है की लंच करके सभी लोग जमीं पे अपनी कुर्सी के पास सो जाते हैं। आदमी औरत कोई भी हो सभी गहरी नींद में मस्त। हमने भी वो दो घंटे चाय पी के गुजारे क्योंकि वहां खाने पिने की ओर कोई व्यवस्था नहीं है। शाम को 5 बजे निकले और बस पकड़ कर 8 बजे वापिस अपने होटल में आराम फ़रमाया।  
                 अब हमारे पास 9 मार्च घूमने के लिए पूरा दिन था। कैसे कैसे घूम जाये ये हमने रात में सोच लिया था। घूमने के लिए सबसे अच्छा  साधन है मोटर साइकिल/स्कूटर। होटल के रेसेप्शन पे बात की तो उन्होंने ही एक्टिवा स्कूटर का इंतेजाम करवा दिया। 24 घंटे के लिए 200 रुपये दिए तथा तेल अपना डलवाया। स्कूटर वाले ने बोला की अगर कहीं पुलिस तंग करे बेशक स्कूटर उन्हें दे देना हम अपने आप ले आएंगे। क्योंकि हेलमेट नहीं था न। 9 मार्च को सुबह नास्ता किया स्कूटर उठाया ,चल दिए पांडिचेरी को खंगालने। सबसे पहले रुख किया पैराडाइस बीच का। रास्ते में शहर के लैंडमार्क याद रखते हुए घूमने लगे ताकि बार बार रास्ता ना पूछना पड़े। नारियल पीते रहे गर्मी का खुमार उतरता रहा। नोननकुप्पम से पैराडाइस बीच के लिए किस्ती से जाया जाता है।
        Whether it is a couple of hours or the entire day Paradise Beach is a must do during your trip to Pondichhery . It is located just 8 KMs from the town along the Cuddalore main road. This Beach can be accessed only from the Chunnamber Resort via boats. The timming for this is from 09:00 to 17:00 Hrs only. This pristine beach is meticulously taken care of and offers a host of benefits from food to beverages to showers and restrooms,all just a few meters away. Swimming is permitted close to the shore only, as current can be strong further in.
      हमने भी स्कूटर पार्क किया 200 रुपये प्रति व्यक्ति के हिसाब से 2 टिकेट लेकर किस्ती में जा बैठे। थोड़ी ही देर में किस्ती की सवारियां पूरी हो गयी तथा वह समुद्र में चल पड़ी। 2 कि मी के बाद हम बीच पैराडाइस पहुँच गए। यह बीच बहुत सूंदर तथा भीड़भाड़ रहित है। एकदम शांत जगह, समुन्दर का पानी बिलकुल साफ़ नीले रंग का। यह बीच टापूनुमा है जिसे के तीन ओर समुन्दर तथा चौथे तरफ नारियल के पेड़ों का जंगल। वहां हमारा सिर्फ 1 घंटा बिताने का प्रोग्राम था लेकिन उस जगह की भव्यता में ऐसे खो गए की जब समय पे नजर दौड़ाई तो चार घंटे बीत चुके थे । इसका खामियाजा भी भुक्तान पड़ा। इस मजे के चक्कर में म्यूजियम छूट गया क्योंकि वो पांच बजे बंद हो जाता है। वापसी की किस्ती पकड़ी तथा स्कूटर उठा कर शहर की तरफ चल पड़े। बोटेनिकल गार्डन ,चर्च ,अरबिंदो आश्रम अदि घूमने के बाद थोड़ी थकान मिटने के लिए चाय पानी लिया। अब शाम हो चुकी थी। आठ बजे तक बीच पर घूम के फोटोग्राफी करते रहे और उसके बाद होटल में जा के सो गए।
          अगले दिन रात आठ बजे की चेन्नई से फ्लाइट थी सो पुरे दिन कुछ देखने के लिए हमारे पास था। सुबह सात बजे यहाँ से चेन्नई के लिए बस से निकल पढ़े। प्लान ये था कि चेन्नई में घूमेंगे। लेकिन रास्ते में प्रोग्राम में तबदीली करी के चेन्नई के बजाये हम मामल्लापुरम जिसे महाबलीपुरम भी कहा जाता है में घूमेंगे। अब बस वाले से बोला की हमें महाबलीपुरम उतार दीजिये। वहां बाईपास पे उतरते ही ऑटो पकड़ा तथा महाबलीपुरम के मंदिर (शोर टेम्पल) पहुँच गए। मंदिरों का शहर महाबलीपुरम तमिल नाडु की राजधानी चेन्नई से 60किमी. दूर बंगाल की खाड़ी के तट पर स्थित है। प्रांरभ में इस शहर को मामल्लापुरम कहा जाता था। तमिलनाडु का यह प्राचीन शहर अपने भव्य मंदिरों, स्थापत्य और सागर-तटों के लिए बहुत प्रसिद्ध है। सातवीं शताब्दी में यह शहर पल्लव राजाओं की राजधानी था। महाबलिपुरम के तट मन्दिर को दक्षिण भारत के सबसे प्राचीन मंदिरों में माना जाता है जिसका संबंध आठवीं शताब्दी से है। यह मंदिर द्रविड वास्तुकला का बेहतरीन नमूना है। यहां तीन मंदिर हैं। बीच में भगवान विष्णु का मंदिर है जिसके दोनों तरफ से शिव मंदिर हैं। मंदिर से टकराती सागर की लहरें एक अनोखा दृश्य उपस्थित करती हैं। यहाँ ग्यारह बजे से दो बजे तक रुकने के दुबारा बाईपास आ कर दोबारा बस पकड़ी। यहाँ से 14 किमी. दूर चैन्नई- महाबलिपुरम रोड़ पर क्रोकोडाइल बैंक स्थित है। इसे 1976 में अमेरिका के रोमुलस विटेकर ने स्थापित किया था। स्थापना के 15 साल बाद यहां मगरमच्छों की संख्या 15 से 5000 हो गई थी। इसके नजदीक ही सांपों का एक फार्म है। यहाँ हर प्रकार के  सांप हैं तथा उनके बारे में जानकारी दी जाती है। आप किसी भी सांप को निकलवा के उसके बारे में हर जानकारी ले सकते हैं। इस प्रकार हमने काफी ज्ञानवर्धक तथा लुत्फभरी यात्रा का समापन किया।

Shailender & Me in Flight

Newspaper in my room

Pondicherry Bus Stand

Lunch time in Annamalai University Chidamabram

Going to Paradise Beach

Paradise Beach

Botanical Garden

Botanical Garden

Church in Pondy

Rock Beach

Temple in a Village

Shore Temple

Shore Temple

Shore Temple

Shore Temple

Shore Temple

Mahabalipuram Beach

Murti Banana Sikhte Hue

Corrocodile Bank

Corrocodile Bank